Thursday, September 5, 2013

दैनिक प्रार्थना

*** गायत्री मंत्र  ***

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं 
भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् 


***दैनिक प्रार्थना ***
तूने मुझे उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियो के कष्ट हरता तू
तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान
सृष्टी की बस्तु  -बस्तु  में, तू हो रहा है विद्यमान
तेरा ही धरते धयान हम, मांगते तेरी दया
ईश्वर हमारी बुद्धि को सही, श्रेष्ठ मार्ग पर चला
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं,
भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
सियावर राम चन्द्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय
उमापति महादेव की जय, राधावर कृष्ण चन्द्र की जय 


***मंगलाचरण ***
जो सुमिरत सिद्ध होय, गणनायक करिवर बदन
करउ अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ गुन सदन
मूक होय वाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन
जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन
नील सरोरुह स्याम, तरुण अरुण बारिज नयन
करउ सो मम उर धाम, सदा क्षीर सागर सयन
कुंद इंदु सम देह, उमा रमा करुणा अयन
जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मर्दन मयन
बंदउ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि
महामोह तं पुंज, जासु वचन रविकर निकर।
दोहा 
 सुनि  बिरंचि मन हरषि तन  पुलकि  नयन  बह नीर,
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मति धीर,
सियावर राम चन्द्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय,
उमापति महादेव की जय, राधावर कृष्ण चन्द्र की जय।


***प्रातः  स्तुति ***
जय जय सुरनायक सुख दायक प्रनतपाल भगवंता 
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिन्धुसुता प्रिय कंता।
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम ना जानइ कोई।

जो सहज कृपाला दीनदयाला करहु अनुग्रह सोई,

जय जय अबिनासी सब घटवासी व्यापक परमानंदा।

अबिगत    चरित पुनीतं माया रहित मुकुंदा।
जेहि लागि विरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिवृन्दा।
निसिबासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।
जेहि सृष्टी उपाई त्रिविध बनाई संग सहाय न दूजा।
सो करउ अघारी चित्त हमारी जानइ भगति न पूजा।
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन वच क्रम बानी छाणि सयानी सरल सकल सुरजूथा।
सारद श्रुतिसेषा रिषय असेषा जा कहु कोउ नहि जाना।
जेहि दीन पियारे वेद पुकारे द्रवउ सो श्री भगवाना।
भव वारिधि मंदर सब बिधि सुन्दर गुन मंदिर सुख पुंजा।
मुनि सिद्धि सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कुंजा।
दोहा
जानि सभय सुर भूमि सुनि वचन समेत सनेह।
गगन गिरा गंभीर भई हरन सोक संदेह।।



***नित्य कीर्तन ***
श्री राम जय राम जय जय राम, जय जय विघ्न हरण हनुमान।
मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सो  दसरथ अजिर बिहारी।।
राजा राम जानकी रानी, आनंद अवध अवधि राजधानी।

जय रघुनन्दन जनक किशोरी, सीता राम मनोहर जोड़ी।

गावहि सुन्दर मंगल गीता, लै लै नाम राम और सीता।

राम कथा ससि किरण समाना, संत चकोर करहि जेहि पाना।
यह वर माँगहू कृपा निकेता, बसहुं ह्रदय श्री अनुज समेता।
कोमल चित अति दीन दयाला, कारण बिनु रघुनाथ कृपाला।
दीनदयाल बिरिदु सम भारी, हरहुं नाथ मम संकट भारी।
बिन सत्संग विवेक ना होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोइ।
राम कथा के तेहि अधिकारी, जिनको सत्संगत अति प्यारी।
राम ही राम रटो मन नर नारी, राम भजन में है सब सुख भारी।
मंगल भवन अमंगल हारी, उमा सहित जेहि जपत पुरारी।
उमा कहउं मै अनुभव अपना, सत हरि भजन जगत सब सपना।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता, बिनु हरि कृपा मिलै नहि संता।
जेहि बिधि होय नाथ हित मोरा, करहु सुबेग दास मै तोरा। 
श्री राम जय राम जय जय राम, जय जय कष्ट हरण हनुमान,
जय मधुसूदन जय घनस्याम, श्री राम जय राम जय जय राम।


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